Bechari Aurat Poem in Hindi

मर्द
शतरंज पर दौड़ता हुआ घोडा है
खेलता है अपनी ही बिसात पर
अपने ही मोहरों के साथ
शह मात का खेल
ढाई कदम की चाल के साथ

रात के अँधेरे में
घर घुसता है
कमीज के एक एक बटन के साथ
खोलता है
मुखौटे के एक एक टिच बटन
धडाम से सोफे पे गिरता है
धडाम से जमीन पे गिरता है मुखौटा
औरत आवाज को महसूस करती है
बिना मांगे आगे कर देती है
पानी का गिलास
तिलमिलाया मर्द
औरत पे खीझता है
पायजामा कुर्ता ,मोज़े, जूते, तौलिया साबुन बनियान
बिसात के हिस्से नहीं है
खीज के कुछ और किस्से हैं
औरत जानती है

औरत जानती है
तरस खाती है
बिखरे अहम् के सिक्के जोडती है
सिरहाने रख देती है मर्द के

सुबह
नाश्ते के वक्त वह सिक्के
फिर से खन खन करने लगते हैं

औरत हंसती है
जानती है
सिक्को की खनखनाहट की व्यर्थेता

मर्द के मुखौटे के पीछे का चेहरा
उसकी औरत
सबसे बेहतर पहचानती है

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