Ajnabi Khawaishein

अजनबी ख्वाहिशें​…​ ​
​​
अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ​;​​​
ऐसे जिद्दी हैं परिन्दें कि उड़ा भी न सकूँ​;​

फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल की दुनिया​;​​
​ये तेरा ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ​;​​

​मेरी ग़ैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे​;​​
​उसने इस तरह बुलाया कि मैं जा भी न सकूँ​;​​

​इक न इक रोज़ कहीं ढूंढ ही लूँगा तुझको​;​​
​ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ​।

If you like this shayari, Please like and share on Facebook

 
   

Please Like MailShayari on Facebook

Mail Shayari on Facebook

Leave a Reply